शनिवार, 28 अप्रैल 2012

जिन्दगी की के रंगीन पेज ही क्यू अच्छे लगते है 
गम न हो तो क्या ख़ुशी के मायने तुम को समझते है 
हर मौसम का मजा अपना है 
न हो बारिश तो क्या हर वक़्त की बहार अच्छी है 
जो न तपता ये सूरज तो क्या खिलखिलाता ये गुलमोहर 
न ढलता ये सूरज तो टिमटिमाते क्या तारे 
क्या चाँद की सुन्दरता न रहा जाती छिपी 
न बहती नदिया प्यासा न रहा जाता समुद्र 
फिर ऋतु क्यू घबराती है तेरा ही परिवर्तन है 
जीवन की डगर में कभी धूप कभी छांव है .ऋतु