सोमवार, 21 मार्च 2011

टेसू के फूल


वन वन आच्छादित पत्र बिहीन पेडो पर टेसू के फूल ,
मेरा ह्रदये भी रीता भावना रहित टेसू के पत्र विहीन  पेड़ सा
टेसू  की डालो डालो अब चिडियों का बसेरा ,
मेरे ह्रदय आँगन मे अब तक सोया सबेरा ,
महुवे की मादकता से वन भये  मतवाले ,
ऋतुराज बसत का रंग है अनोखा ,
चाहू और है उमंग  छाई  मतवाली ,
गोरी के गालो मे छाई अबीर की लाली ,
अमररायियो  में चली  पुरवाई मतवाली ,
उमगो ने ली धीरे धीरे  फिर अगड़ाई ,
पलाश के फूल विरहनी की ह्रदये मे आग जलाई ,
धधक उठा फिर हृदये की सुप्त अभिलाषाए ,
झर उठे गोरी की आँखों से भी टेसू  के फूल.इरा ऋतु पांडे २१/०३/२०११

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

तेरा अहसास

न हो तू जो मेरे सामने ,दिल डूब सा जाता है ,
एक लम्हा मुझे एक सदी का अहसास करा जाता है .

मेरी जिंदगी तो रेगिस्तान के कैक्ट्स सी थी ,
तेरा अहसास इस कैक्ट्स मै फूल खिला जाता है .

हर जगह तू नजर आता है , तेरा नाम पहले आता है ,
और उन्हें हमें अनदेखा करने मे मजा आता है .

न जाने क्यू  ये अनहोनी मेरे साथ हो गयी ,
जिंदगी की रफ़्तार एक ख़ूबसूरत  मोड़ मे थम गयी .

तू हो सामने ये  लम्हा यही रुक जाये दिल कहता है ,
तेरे प्यार के दरिया मे गोते लगाने का दिल कहता है .

तेरे रूठने के अहसास से भर से ये दिल डूबते चला जाता है ,
और वो है की हमें डूबते देखने मे मजा आता है .
             इरा ऋतु  दुबे १८ /०३/२०११/

मंगलवार, 8 मार्च 2011

''तुझको सब कुछ अर्पित "

  नारी हू मै कोमल मन ,कोमल काया, कोमल ह्रदये पाया,
  मै ही अनन्त आकाश ,असीमित धरा  मै ही ,
 ज्वालावो से जल ज्वाला बनी मै ,बांहों मै तेरी शांत निर्झरनी,
 कोमल आँगन  का हर कोना महकता भावों के पुष्पों से,
 आँचल  का हर कोना तेरी खुशियों से हरा भरा,
 तुझ मै खुद को खुद मै तुझ को समेटना चाहती हूँ  ,
 तुझ मै खुद को समाहित कर पूण होना चाहती हूँ ,
  नारी हू मै कोमलागी वेदना  पीड़ा अपने मन की,
 तुझ ने दी तुझे को ही अर्पित करना चाहती हूँ ,
 क्या हुवा जो तुने जनम लिया मेरी कोख से,
 तेरी परछाई बन तेरी मन की अभिमान बनाना चाहती  हूँ ,
  नारी हू मै अगले जनम नारी ही बनाना चाहती हूँ ,
  तेरी हूँ तुझ को ही अर्पित होना चाहती हूँ  .(इरा पाण्डेय  )ऋतु दुबे      ०७/०३/2011
            महिला दिवस की पूर्व संध्या   पर आप सभी महिलावो को     समर्पित.महिला दिवस की शुभकामना .

सोमवार, 7 मार्च 2011

 नारी हू मै कोमल मन ,कोमल काया, कोमल ह्रदये पाया,
  मै ही अनन्त आकाश ,असीमित धरा  मै ही ,
 ज्वालावो से जल ज्वाला बनी मै ,बांहों मै तेरी शांत निर्झरनी,
 कोमल आँगन  का हर कोना महकता भावों के पुष्पों से,
 आँचल  का हर कोना तेरी खुशियों से हरा भरा,
 तुझ मै खुद को खुद मै तुझ को समेटना चाहती हूँ  ,
 तुझ मै खुद को समाहित कर पूण होना चाहती हूँ ,
  नारी हू मै कोमलागी वेदना  पीड़ा अपने मन की,
 तुझ ने दी तुझे को ही अर्पित करना चाहती हूँ ,
 क्या हुवा जो तुने जनम लिया मेरी कोख से,
 तेरी परछाई बन तेरी मन की अभिमान बनाना चाहती  हूँ ,
  नारी हू मै अगले जनम नारी ही बनाना चाहती हूँ ,
  तेरी हूँ तुझ को ही अर्पित होना चाहती हूँ  .(इरा पाण्डेय  )ऋतु दुबे      ०७/०३/2011
            महिला दिवस की पूर्व संध्या   पर आप सभी महिलावो को     समर्पित.महिला दिवस की शुभकामना .

 



दिल की बात-------: दिल की बात-------: ''तुझको सब कुछ अर्पित "

दिल की बात-------: दिल की बात-------: ''तुझको सब कुछ अर्पित "