जहा तक हो सके तुम मुझे समझ लेना
एक किताब सा मुझे पढ़ लेना
पर किताब सा अलमारी के कोने में न रखना
मेरे आँखों में उभरते है भावों
मेरे हर भावों में भरा है तेरे लिए प्यार
उन भावों को तुम समझे लेना
फिर न कहना नहीं करती हो तुम इज़हार .ऋतु
रविवार, 29 जनवरी 2012
लो बसंत आया
फिर झड़ने लगे वृक्षों के पत्ते
प्रकृति मे जगा फिर कोमल अहसास
कोपल कपोलो से करती
वो मुस्कुरा कर बसंत का अभिनंदन
खिल उठे चाहू दिशा सरसों के फूल
चली शीतल बयार मतवाली
कोयल कुहुकने लगी डाली डाली
बौरा गए आम भी होकर मद मस्त
नदियों का प्रवाह हुआ मध्यम
गोरी के ह्रदय में गूजे गीत थम थम
गेहू की बालिया भी हवा में इठलाकर करती खुशियों का इज़हार
चटकी नवकालिया चहु और आया फिर देख मधु मास (बसंत ऋतु )
प्रकृति मे जगा फिर कोमल अहसास
कोपल कपोलो से करती
वो मुस्कुरा कर बसंत का अभिनंदन
खिल उठे चाहू दिशा सरसों के फूल
चली शीतल बयार मतवाली
कोयल कुहुकने लगी डाली डाली
बौरा गए आम भी होकर मद मस्त
नदियों का प्रवाह हुआ मध्यम
गोरी के ह्रदय में गूजे गीत थम थम
गेहू की बालिया भी हवा में इठलाकर करती खुशियों का इज़हार
चटकी नवकालिया चहु और आया फिर देख मधु मास (बसंत ऋतु )
मंगलवार, 6 सितंबर 2011
क्षणिकाए जो मेरे दिल मै आ गयी
कल; रात मेरी उदासियो का सिलसिला जारी रहा
में ने जो अपनी दस्ता बदलो को सुनाई
वो रात दिन सिसकते रहे धरा को भिगोते रहे
में जिन्दगी जीने की फिर एक कोशिश में
चेहरे में मुस्कान का मुखोटा लगा
फिर जीने का नया अकुर रोप दिया गीली धरा में .ritu
रिश्तो की डोर को तोड़ता है ये पैसा
प्यार को दुश्मन में बदलता है ये पैसा
आदमी को इंसानियत से दूर ले जाता है ये पैसा
रिश्तो को भीड़ में अकेला करता है ये पैसा
हम से तो वो अकेले ही अच्छे भीड़ में भी तनहा नहीं
भाई को भाई कहने से रोकता है ये पैसा
दूसरो के लिए बहुत है अपनों के लिए कम है ये पैसा
परेशानियों में ही रिश्तो की पहचान दिखता है ये पैसा,ritu
'रिश्ता और पैसा '
रिश्ता और पैसा
तड़पता है दिल रिश्तो की हिलती बुनियाद के लिए
जी ढह गयी पैसे के लिए
कर्णधार था जो घर का आधारहीन निकला
कभी कि थी जो सहायता भाई भाई के लिए
पुराना वो हिसाब बे हिसाब निकला
बाप कि अर्थी उठाते ही
बेदिलो के दिल से बे हिसाब निकला
नकाब उतार गए चेहरों के
जो ह्रदय विशाल थे कभी
वो ह्रदय विहीन निकले
अर्थी एक उठी नकाब कई निकले
चिथड़े चिथड़े हो गयी मर्यादा रिश्तो की
अब पैबंद लगाना भी नागवार गुजरे
जो भाई था कभी बेटे के सामान
वो आस्तीन का संपा निकला
जो भाई था बाप के सामान
वही रिश्तो में अंगार निकला
अपनी ही जड़ो को कटता
कालिदास सा ये परिवार निकला .ऋतु इरा दुबे
तड़पता है दिल रिश्तो की हिलती बुनियाद के लिए
जी ढह गयी पैसे के लिए
कर्णधार था जो घर का आधारहीन निकला
कभी कि थी जो सहायता भाई भाई के लिए
पुराना वो हिसाब बे हिसाब निकला
बाप कि अर्थी उठाते ही
बेदिलो के दिल से बे हिसाब निकला
नकाब उतार गए चेहरों के
जो ह्रदय विशाल थे कभी
वो ह्रदय विहीन निकले
अर्थी एक उठी नकाब कई निकले
चिथड़े चिथड़े हो गयी मर्यादा रिश्तो की
अब पैबंद लगाना भी नागवार गुजरे
जो भाई था कभी बेटे के सामान
वो आस्तीन का संपा निकला
जो भाई था बाप के सामान
वही रिश्तो में अंगार निकला
अपनी ही जड़ो को कटता
कालिदास सा ये परिवार निकला .ऋतु इरा दुबे
शनिवार, 30 जुलाई 2011
रिमझिम फुहार
रिमझिम फुहार में मन मयूर सा नाच रहा
बदलो की ओट से मेरा प्रियतम झांक रहा
अठखेलियाँ करती चपला मेरा दिल कंपा रहा
कलकल करती सरिताए नव संगीत लहरी छिड़ रही
हरियाली चुनर ओढ़ी धरा ने उस में बीरबहूटी सज रही
किसी कोने में छिपा मेरा बच्चपन अंगडाई ले रही
फिर कागज की नाव में प्यार की पतवार लिए
प्यार की पतवार से जीवन नैया खे रहा .ऋतु दुबे
व्यथित मन ,
व्यथित है मन ,
भटकता भावों की इन गलियन से उन गलियन
कभी लौटता उस बिंदु में
भावों की नदियों में बांध बांधता
फिर उफान मारता
अचानक हिलोरे लेता
बहा ले जाता सब कुछ
फिर वही व्यथित मन
व्यथित ही रह जाता
जैसे भवर में फंसी पोत ..ऋतु दुबे
क्यों तुम मेरे अस्तिव में छाये हुए हो
क्यों ह्रदये को भरमाये हुए हो
मेहमा बन के बादल की तरह छाये हुए हो तुम एक बार बरस के चल दोगे अपनी राह मै फिर रह जाऊगी अधूरी प्यासी सी
मै पुराने बरगद की पुरानी सखा सी
तुम नयी बहार के नए गुल हो
कल अखरेगी पुरानी शाख तुम्हे
कल फिर तुम आकर्षित होगे नए फूलो पर
क्यों तुम मेरी उपासना भंग करने पर अमादा...
क्यों ह्रदये को भरमाये हुए हो
मेहमा बन के बादल की तरह छाये हुए हो तुम एक बार बरस के चल दोगे अपनी राह मै फिर रह जाऊगी अधूरी प्यासी सी
मै पुराने बरगद की पुरानी सखा सी
तुम नयी बहार के नए गुल हो
कल अखरेगी पुरानी शाख तुम्हे
कल फिर तुम आकर्षित होगे नए फूलो पर
क्यों तुम मेरी उपासना भंग करने पर अमादा...
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